dna analysis coronavirus covid 19 vaccine india vaccination drive against corona | DNA ANALYSIS: कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में भारत को कैसे मिली सफलता, जानिए 5 बड़ी वजहें

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नई दिल्‍ली:  दुनिया को कोरोना वायरस की महामारी से लड़ते हुए एक वर्ष पूरा हो गया है. आज से ठीक एक साल पहले 11 मार्च को WHO ने कोरोना वायरस को एक महामारी घोषित किया था और इस एक साल में क्या क्या परिवर्तन हो चुके हैं, आज हम इसी का विश्लेषण करेंगे. 11 मार्च 2020 को जब WHO ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित किया, उससे एक दिन पहले भारत में होली का त्योहार था और तब होली का रंग बहुत फीका रहा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस दिन लोगों से अपील की थी कि वो होली मिलन कार्यक्रमों में हिस्सा न लें और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर जाने से बचें. तब खुद प्रधानमंत्री भी इन बातों पर अमल कर रहे थे और लोगों से भी ऐसा करने के लिए कह रहे थे.

हालांकि उस समय लोगों के मन में डर था, घबराहट थी और हर किसी को ये लग रहा था कि जब चीन, अमेरिका और यूरोप के कई बड़े देश कोरोना वायरस के आगे बेबस हैं तो भारत आखिर क्या कर लेगा. 

दुनिया की सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था

उस समय परिस्थितियां भारत को वक्‍त की कसौटी पर परख रही थीं और तब देश के प्रति उसकी योग्यता, क्षमता और प्रयासों को लेकर अपने ही देश के लोगों में विश्वास की कमी थी. सबको यही लग रहा था कि कोरोना वायरस के खिलाफ इस युद्ध में भारत दुनिया के लिए सबसे कमजोर कड़ी साबित होगा, लेकिन ये सारे अनुमान धरे रह गए और आज भारत न सिर्फ इस युद्ध को जीतने की स्थिति में है, बल्कि हम दुनिया को ये सिखा रहे हैं कि बड़ी लड़ाईयां कैसे जीती जाती हैं. इस एक वर्ष में भारत ने कई मुश्किलों का सामना किया और इनमें कामयाबी भी हासिल की.

कई बड़े झटके खाने के बाद अब भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से उबर रही है और 37 देशों के एक संगठन  Organisation for Economic Co-operation and Development का अनुमान है कि भारत की अर्थव्यवस्था वर्ष 2021 में दुनिया की सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगी. यानी हम चीन और अमेरिका से भी आगे रहेंगे.

कोरोना वायरस के खिलाफ एक नहीं, दो वैक्‍सीन

आज देश को कोरोना वायरस की एक नहीं, दो-दो वैक्सीन मिल चुकी हैं और ये दोनों वैक्सीन भारत में विकसित की गई हैं. दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान भारत में चल रहा है और अब तक 2 करोड़ 40 लाख लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है.

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि भारत में कोरोना वायरस के प्रति दिन लगभग 17 हजार नए मामले सामने आ रहे हैं, जबकि आज से 6 महीने पहले 16 सितंबर को ये आंकड़ा लगभग 98 हजार था. यानी भारत में उस समय हर रोज कोरोना से संक्रमित होने वाले मरीजों की संख्या एक लाख के करीब थी, लेकिन हमारे देश ने इस लड़ाई को कमजोर नहीं होने दिया और आज ये संख्या सिर्फ 17 हजार रह गई है.

भारत ने ये लड़ाई कैसे जीती?

आज जब कोरोना वायरस को एक वर्ष पूरा हो गया है, तब ये समझना जरूरी है कि भारत ने ये लड़ाई कैसे जीती. भारत ने ये लड़ाई संयम से जीती और हमने दुनिया को ये दिखाया कि संयम से बड़ा कोई अस्त्र, कोई शस्त्र नहीं है. जब हमारे देश को लेकर कई तरह के कयास और अनुमान लगाए जा रहे थे. कहा जा रहा था कि भारत जो आबादी के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है और जहां लोगों के बीच सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराना नामुमकिन है, तब इन सब बातों को हमने ग़लत साबित किया और हमारे देश के लोगों ने दिखाया कि जब कोई संकट हमारे देश पर आता है तब हम अनुशासित रह कर अपनी असली ताकत दुनिया को दिखा सकते हैं.

सफलता के पीछे ये रहे कारण

आज हम भारत की इसी अद्भुत सफलता का DNA टेस्ट करेंगे, लेकिन उससे पहले हम आपको एक वीडियो विश्लेषण दिखाना चाहते हैं, जिसे देख कर आपको अहसास होगा कि पिछले वर्ष मार्च के महीने में भारत में क्या स्थिति थी और कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संकट के समय भी देश को इससे बाहर निकालने की योजना पर काम कर रहे थे और लॉकडाउन इस कड़ी में पहला बड़ा कदम था.  इस सफलता के पीछे कई बड़ी वजहें हैं. 

-भारत में पिछले वर्ष 24 मार्च को दुनिया का सबसे बड़ा और प्रभावशाली लॉकडाउन लागू किया गया और उस दौरान चार लॉकडाउन लगाए गए और कुल 70 दिनों के लिए देश के सभी लोग अपने घरों में क़ैद रहे.

-लॉकडाउन के दौरान ही Three Zone Category भी अपनाई गई, जिसके तहत इलाक़ों को Red, Orange और Green Zone में बांट दिया गया.

– Red Zone में वो इलाके आए, जहां कोरोना वायरस का संक्रमण था.

– Orange Zone वाले इलाकों में इसके फैलने का आशंका थी.

– और Green Zone में वो इलाक़े थे, जहां संक्रमण का एक भी मामला नहीं था.

हालांकि तब सरकार की इस नीति की काफी आलोचना हुई और ये भी कहा गया कि ऐसा करके लोगों से भेदभाव किया जा रहा है, लेकिन सरकार इसके बावजूद दबाव में नहीं आई और उसे इसके अच्छे नतीजे मिले. 

-कोरोना वायरस को रोकने के लिए भारत ने विदेशी और घरेलू यात्राओं को लेकर कड़े प्रतिबंध लगाए और अब भी सीमित रूप में कुछ पाबंदियां जारी हैं.

-इसके अलावा कोरोना वायरस की टेस्टिंग क्षमता पर जोर दिया गया और कॉन्‍टैक्‍ट ट्रेसिंग के लिए भी अलग से नीति अपनाई गई. इससे कोरोना के संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए लोगों की पहचान की जा सकी और ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों के टेस्ट भी किए गए.

उदाहरण के लिए 9 मार्च को यानी कल भारत में 7 लाख 63 हजार टेस्ट किए गए थे,  लेकिन आपको याद होगा आज से एक साल पहले कांग्रेस के कई नेता ये कह रहे थे कि भारत में टेस्टिंग स्‍पीड काफी स्‍लो यानी धीमी है और ऐसा इसलिए हो रहा है ताकि कम मामले दर्ज हों, जबकि ये आरोप बिल्कुल बेबुनियाद थे और राजनीति से प्रेरित थे.

-ये सरकार की दूरदर्शी सोच ही थी कि जब पूरी दुनिया इस बात से अनजान थी कि कोरोना वायरस बच्चों के लिए कितना खतरनाक हो सकता है, तब भी केंद्र सरकार ने कड़े कदम उठाए और स्कूल और कॉलेजों को बंद करने में जरा भी संकोच नहीं किया. ऐसा करके सरकार ने बताया कि उसकी पहली प्राथमिकता बच्चों की जान बचाना है. लॉकडाउन के दौरान 15 लाख स्कूल बंद थे, जिनमें 28 करोड़ 60 छात्र पढ़ते हैं.

-उस दौरान भारत में मास्‍क की काफी किल्लत हो गई थी और इसकी वजह से लोगों में डर का माहौल था, लेकिन कुछ ही दिनों में ये स्थिति बदल गई और भारत की कई कंपनियों ने मास्‍क बनाने शुरू कर दिए और आज स्थिति ये है कि भारत दूसरे देशों को अच्छी क्‍वालिटी के मास्‍क एक्‍सपोर्ट कर रहा है और PPE किट बनाने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया है.

-पिछले साल लॉकडाउन लगने से पहले भारत में कोरोना वायरस की जांच के लिए देश में सिर्फ एक लेबोरेटरी थी, लेकिन अब ये संख्या भी 2300 हो गई है.

जागरूकता फैलाने के लिए कॉलर ट्यून 

यहां हम एक बात और आपको बताना चाहते हैं और वो ये कि भारत में कोरोना वायरस को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए एक कॉलर ट्यून बनाई गई थी और इसका काफी विरोध भी हुआ था. तब सोशल मीडिया पर इस तरह के मीम बनाए गए थे कि दुनिया कोरोना वायरस की वैक्सीन बना रही है और भारत कॉलर ट्यून बना रहा है. इस विषय को लेकर भारत का मजाक बनाया गया, लेकिन सच्चाई ये है कि इस कॉलर ट्यून की मदद से ही सरकार लोगों को जागरूक कर पाई और मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का सख्‍ती से पालन हुआ. 

सबसे बड़ी बात ये है कि जिस समय कॉलर ट्यून को लेकर भारत का मजाक उड़ाया जा रहा था, उस समय हमारे वैज्ञानिक कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने पर चुपचाप मेहनत कर रहे थे, जिसमें उन्हें बाद में कामयाबी भी मिली.

मेड इन इंडिया वैक्सीन 

भारत ने पूरी दुनिया को चौंकाते हुए कोरोना की मेड इन इंडिया वैक्सीन बनाई और अब तक दुनिया के कुल 66 देशों को 5 करोड़ 81 लाख वैक्सीन की डोज एक्‍सपोर्ट भी की जा चुकी है. बड़ी बात ये है कि इनमें से 80 लाख वैक्सीन मुफ्त में दी गई हैं. 

हमारे देश के लिए ये सफलता इसलिए भी बड़ी है क्योंकि, जब भारत में कोरोना वायरस के मामले बढ़ने शुरू हुए थे. तब अमेरिका के एक हेल्‍थ केयर इंस्‍टीट्यूट ने ये अनुमान जताया था कि भारत में इससे 60 करोड़ लोग संक्रमित हो सकते हैं जबकि 50 लाख लोगों की जान सकती है, जबकि आज का अपडेट ये है कि इस बीमारी से लगभग डेढ़ लाख लोगों की ही मौत हुई है. 

ये तीन बातें भी सफलता की वजह बनीं

कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में भारत को मिली इस सफलता की तीन और बड़ी वजहे हैं. 

पहली वजह है,  पुरानी महामारियों से निपटने का अनुभव 1918 में भारत ने पहले विश्व युद्ध के दौरान स्‍पैनिश फ्लू का सामना किया, जिससे एक करोड़ से ज्‍यादा लोगों की मौत हुई थी. फिर 1994 में प्‍लेग नाम के वायरस पर काबू पाया और 2009 में भारत ने स्‍वाइन फ्लू का मुकाबला किया. यानी कोरोना वायरस के संकट से निपटने में पुराना अनुभव काफी मददगार साबित हुआ.

दूसरी वजह है, गांवों के मुकाबले शहरों में कम आबादी. भारत में आज भी सिर्फ 30 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है और यही वजह है कि देश में कोरोना वायरस के मामले तो बढ़े लेकिन हम कभी भी कम्‍युनिटी ट्रांसमिशन की स्‍टेज में नहीं गए

और तीसरी वजह है, लिमिटेड ट्रैवल यानी सीमित यात्रा और इसको लेकर की गई सख़्ती. 

भारत के लिए कोरोना वायरस का ये एक वर्ष कई अनुभवों से भरा रहा है और आप कह सकते हैं कि अब हमारे देश के रेज्‍यूमे में ये अनुभव भी शामिल हो गए हैं. यानी अब जब भी दुनिया में इस तरह का कोई संकट आएगा तो भारत को हमेशा उसकी इस सफलता और अनुभव के लिए याद किया जाएगा.

एक वर्ष में आए कई बदलाव  

हम स्कूलों में Health is Wealth और Honesty is The Best Policy जैसी बातें पढ़ते आए हैं लेकिन इन बातों को लेकर हमने कभी गंंभीरता नहीं दिखाई, लेकिन इस महामारी ने इसे लेकर भी हमारी धारणा बदल दी और इस एक वर्ष में कई बदलाव आए. ये बदलाव क्या हैं, अब ये जानिए-

पहला बदलाव है Work From Home, भारत एक ऐसा देश है,  जहां ये कहा जाता है कि घर और काम को अलग रखना चाहिए. लेकिन इस महामारी ने ये धारणाएं भी तोड़ दीं और हमारे देश ने कामकाज की संस्कृति में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव देखा. आज बहुत से लोगों का घर ही उनका दफ़्तर बन गया है और बेडरूम, मीटिंग रूम का रूप ले चुका है. आप कह सकते हैं कि अगर कोरोना वायरस नहीं होता तो वर्क फ्रॉम होम की संस्कृति को अपनाने में हमारे देश के लोगों को कई वर्ष लग जाते.

इस पूरी समय अवधि में हमने एक और परिवर्तन देखा और वो ये कि भारत में अब बहुत से लोग वाई फाई वाली लाइफ के मोड में जा चुके हैं. आज हमारे देश में डाटा, आटा जितना ही महत्वपूर्ण हो गया है और भारत में इंटरनेट यूजर्स की संख्या बढ़कर 70 करोड़ हो चुकी है. आज बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए इंटरनेट चाहिए, वर्क फ्रॉम होम के लिए इंटरनेट जरूरी है. राशन और दूसरी चीजों की खरीदारी भी आप ऑनलाइन कर सकते हैं और अब मनोरंजन भी ऑनलाइन स्‍ट्रीम होने लगा है. लोगों के जीवन में आए इस परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह कोरोना वायरस ही है.

इस महामारी की वजह से एक और बड़ा परिवर्तन ये हुआ कि लोग अपनी इम्‍युनिटी को लेकर जागरूक हो गए. बहुत से लोगों को पहली बार ये पता चला कि बीमारियों से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होना जरूरी है. कोरोना की वजह से लोग अपने स्वास्थ्य को लेकर न सिर्फ जागरूक हुए, बल्कि इम्‍युनिटी बढ़ाने के लिए आज तरह तरह के नुस्खे अपनाए जाते हैं और आयुर्वेदिक पद्धति इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. इस महामारी से पहले शायद ही आपने लोगों के मुंह से सुना होगा कि वो नाश्ते या खाने के बाद काढ़ा पीना चाहेंगे या आपने लोगों को भीषण गर्मी के दिनों में च्यवनप्राश खाते हुए देखा होगा, लेकिन अब ये सारी बातें आम हैं. आज लोग समझ गए हैं स्वास्थ्य ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है और इसे सही रखने के लिए इम्‍युनिटी का स्‍ट्रॉन्‍ग होना बहुत जरूरी है.

विदेश जाने के लिए हेल्‍थ पासपोर्ट 

Health Is Your New Passport यानी आपका स्वास्थ्य ही अब आपका नया पासपोर्ट है. ये परिवर्तन भी इस महामारी की वजह से लोगों में आया. आज अगर आपको कोई बीमारी है, बुखार है या कोई और परेशानी है,  तो किसी दूसरे देश में ट्रैवल करना अब आसान नहीं रह गया है. पहले कहा जाता था कि जिन लोगों के पास पैसा है, जो धनवान हैं, समृद्ध हैं, वही दुनिया में घूम सकते हैं और दुनिया देख सकते हैं. लेकिन अब ये धारणा भी बदल गई है. अब वही लोग दुनिया देख सकते हैं, जो स्वस्थ हैं क्योंकि, आपका स्वस्थ शरीर ही आपका अब नया पासपोर्ट बन चुका है. सिंगापुर में तो इसे लेकर एक प्रयोग भी शुरू हुआ है, जिसके तहत लोगों के पास उनका Digital Health Passport होना जरूरी है.

कोरोना वायरस की वजह से सिर्फ व्यवस्थाएं ही नहीं बदलीं, बल्कि इससे लोगों की सोच में भी बहुत बड़ा परिवर्तन आया है. भागदौड़ भरी जिंदगी की वजह से जो लोग पहले ये कहते थे कि परिवार के लिए उनके पास समय नहीं है. आज उनकी ये सोच बदली है. अब लोग ये समझ चुके हैं कि पैसों से बड़ा अगर कुछ है, तो वो है परिवार. परिवार किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी रीढ़ होता है और अगर रीढ़ कमज़ोर हो जाए या टूट जाए तो पैसा किसी काम नहीं आता. 

घर सबसे बड़ा मंदिर 

इस पूरे एक वर्ष के दौरान लोग ये भी समझे कि घर एक मंदिर  है. जिस समय देश में लॉकडाउन लगा और सारे धार्मिक स्थल, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च बंद थे, तब बहुत से प्रवासी मजदूर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घर के लिए पैदल ही सड़कों पर चल दिए थे. वो बस अपने घर आना चाहते थे. यही नहीं, विदेशों में फंसे छात्रों ने भी उस समय भारत सरकार से अपने घर लौटने की अपील की और तब ये सभी लोग कह रहे थे कि वो अपने घर पर ही मरना पसंद करेंगे. यानी अपने घरों से दूर रहने वाले लोगों को ये समझ आया कि सबसे बड़ा अगर कोई मंदिर है, तो वो घर है और घर ही एक ऐसा स्थान है, जो संकट की घड़ी में भी हमारा साथ नहीं छोड़ता और हमें अपने पास खींचता है.

जन्‍म और मृत्यु की परंपराएं बदलीं 

इस महामारी ने जीवन और मृत्यु की परंपराओं को भी हमेशा के लिए बदलकर रख दिया. कोरोना वायरस के दौरान मरने वाले लोगों के जीवन के अंतिम पलों में भी उनके साथ कोई नहीं था और जब मौत आई तो भी ये अकेलापन दूर नहीं हुआ क्योंकि, संक्रमण के डर की वजह से या तो सरकारों ने लोगों को अंतिम संस्कार में जाने की इजाजत नहीं दी या फिर डर के मारे खुद लोगों ने ही किसी की अंतिम यात्रा में शामिल होना ठीक नहीं समझा.

आपको याद होगा जब पिछले वर्ष 31 अगस्त को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का निधन हुआ था. तब उनका परिवार अंतिम संस्कार में PPE किट पहन कर शामिल हुआ था. इसी तरह शहीद ऋषिकेश जोंधले के अंतिम संस्कार में भी परिवार ने PPE किट पहना हुआ था.

कोरोना वायरस ने मृत्यु की परम्पराएं भी बदली और जन्म की भी.  पिछले साल सोशल मीडिया पर इसे दिखाती एक तस्‍वीर भी वायरल हुई थी. तब UAE के एक अस्पताल में जन्म के बाद एक बच्चा, डॉक्टर के चेहरे से मास्क खींचता हुए नज़र आया था.

तो ये परिवर्तन की वो श्रृंखला है,  जो महामारी के बाद अस्तित्व में आई और आज ये सभी बदलाव हमारे जीवन का हिस्सा बन चुके हैं. 

महामारी की वजह से हुआ बड़ा परिवर्तन 

हालांकि इस महामारी की वजह से हुए एक और बड़े परिवर्तन की तरफ हम आपका ध्यान खींचना चाहते हैं. ये परिवर्तन पाकिस्तान से जुड़ा है. भारत, पाकिस्तान को मुफ्त में कोरोना वायरस की साढ़े 4 करोड़ वैक्सीन की डोज देगा. पाकिस्तान ये वैक्सीन हमसे सीधे न लेकर G.A.V.I अलायंस के अनुबंधों के जरिए ले रहा है. G.A.V.I अलायंस  WHO,यूनिसेफ, वर्ल्ड बैंक, द बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और कई बड़ी फार्मा कम्पनियों का एक ग्रुप है, जो गरीब देशों के बच्चों को मुफ्त में वैक्सीन की सुविधा देता है. पाकिस्तान की आबादी करीब 21 करोड़ है और वैक्सीन लेने के लिए वो दुनिया के कई देशों से गुहार लगा रहा है. अब आप खुद सोचिए कि भारत में आतंकवाद एक्‍सपोर्ट करने वाला पाकिस्तान अब अपने लोगों की जान बचाने के लिए भारत में बनी वैक्सीन इस्तेमाल करेगा.



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